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शान्ति पर्व
अध्याय १२
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वैशम्पाय़न उवाच
क्षात्रेण धर्मेण पराक्रमेण; जित्वा महीं मन्त्रविद्भ्यः प्रदाय़ |  ३६   क
नाकस्य पृष्ठेऽसि नरेन्द्र गन्ता; न शोचितव्यं भवताद्य पार्थ ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति