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शान्ति पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
यो वै न पापे निरतो न पुण्ये; नार्थे न धर्मे मनुजो न कामे |  ४२   क
विमुक्तदोषः समलोष्टकाञ्चनः; स मुच्यते दुःखसुखार्थसिद्धेः ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति