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द्रोण पर्व
अध्याय १२३
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सञ्जय़ उवाच
हन्तास्मि वृषसेनं ते प्रेक्षमाणस्य संय़ुगे |  १६   क
ये चान्येऽप्युपय़ास्यन्ति वुद्धिमोहेन मां नृपाः |  १६   ख
तांश्च सर्वान्हनिष्यामि सत्येनाय़ुधमालभे ||  १६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति