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अनुशासन पर्व
अध्याय १०
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राजो उवाच
विपर्ययेण मे मन्युस्तेन सन्तप्यते मनः |  ५३   क
जातिं स्मराम्यहं तुभ्यमतस्त्वां प्रहसामि वै ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति