शान्ति पर्व  अध्याय ५०

वैशम्पाय़न उवाच

शराभिघातदुःखात्ते कच्चिद्गात्रं न दूय़ते |  १४   क
मानसादपि दुःखाद्धि शारीरं वलवत्तरम् ||  १४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति