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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
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संवर्त उवाच
स्वागतं ते पुरुहूतेह विद्व; न्यज्ञोऽद्याय़ं संनिहिते त्वय़ीन्द्र |  २१   क
शोशुभ्यते वलवृत्रघ्न भूय़ः; पिवस्व सोमं सुतमुद्यतं मय़ा ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति