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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
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इन्द्र उवाच
जानामि ते गुरुमेनं तपोधनं; वृहस्पतेरनुजं तिग्मतेजसम् |  २३   क
यस्याह्वानादागतोऽहं नरेन्द्र; प्रीतिर्मेऽद्य त्वय़ि मनुः प्रनष्टः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति