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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
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संवर्त उवाच
यदि प्रीतस्त्वमसि वै देवराज; तस्मात्स्वय़ं शाधि यज्ञे विधानम् |  २४   क
स्वय़ं सर्वान्कुरु मार्गान्सुरेन्द्र; जानात्वय़ं सर्वलोकश्च देव ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति