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सभा पर्व
अध्याय ६२
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वैशम्पाय़न उवाच
यद्येष गुरुरस्माकं धर्मराजो युधिष्ठिरः |  ३२   क
न प्रभुः स्यात्कुलस्यास्य न वय़ं मर्षय़ेमहि ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति