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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
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व्यास उवाच
ततः संवर्तश्चित्यगतो महात्मा; यथा वह्निः प्रज्वलितो द्वितीय़ः |  ३१   क
हवींष्युच्चैराह्वय़न्देवसङ्घा; ञ्जुहावाग्नौ मन्त्रवत्सुप्रतीतः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति