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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
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मरुत्त उवाच
त्वं चैवैतद्वेत्थ पुरन्दरश्च; विश्वेदेवा वसवश्चाश्विनौ च |  ५   क
मित्रद्रोहे निष्कृतिर्वै यथैव; नास्तीति लोकेषु सदैव वादः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति