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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
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मरुत्त उवाच
वृहस्पतिर्याजय़िता महेन्द्रं; देवश्रेष्ठं वज्रभृतां वरिष्ठम् |  ६   क
संवर्तो मां याजय़िताद्य राज; न्न ते वाक्यं तस्य वा रोचय़ामि ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति