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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
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गन्धर्व उवाच
घोरो नादः श्रूय़ते वासवस्य; नभस्तले गर्जतो राजसिंह |  ७   क
व्यक्तं वज्रं मोक्ष्यते ते महेन्द्रः; क्षेमं राजंश्चिन्त्यतामेष कालः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति