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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १०
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धृतराष्ट्र उवाच
व्यवहाराश्च ते तात नित्यमाप्तैरधिष्ठिताः |  १   क
योज्यास्तुष्टैर्हितै राजन्नित्यं चारैरनुष्ठिताः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति