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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १०
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धृतराष्ट्र उवाच
स्वरन्ध्रं पररन्ध्रं च स्वेषु चैव परेषु च |  १४   क
उपलक्षय़ितव्यं ते नित्यमेव युधिष्ठिर ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति