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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १०
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धृतराष्ट्र उवाच
परिमाणं विदित्वा च दण्डं दण्ड्येषु भारत |  २   क
प्रणय़ेय़ुर्यथान्याय़ं पुरुषास्ते युधिष्ठिर ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति