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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
गते वज्रधरे राजंस्तत्र वर्षं पपात ह |  ५३   क
पुष्पाणां भरतश्रेष्ठ दिव्यानां दिव्यगन्धिनाम् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति