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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १०
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धृतराष्ट्र उवाच
प्रातरेव हि पश्येथा ये कुर्युर्व्ययकर्म ते |  ५   क
अलङ्कारमथो भोज्यमत ऊर्ध्वं समाचरेः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति