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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १०
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धृतराष्ट्र उवाच
कोशस्य सञ्चय़े यत्नं कुर्वीथा न्याय़तः सदा |  ९   क
द्विविधस्य महाराज विपरीतं विवर्जय़ेः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति