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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
भैक्षचर्या न विहिता न च विट्शूद्रजीविका |  ५०   क
क्षत्रिय़स्य विशेषेण धर्मस्तु वलमौरसम् ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति