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द्रोण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
स्वेषां प्रिय़हिते युक्तं पितॄणां जय़गृद्धिनम् |  ३२   क
न च पूर्वप्रहर्तारं सङ्ग्रामे नष्टसम्भ्रमम् |  ३२   ख
यदि पुत्रं न पश्यामि यास्यामि यमसादनम् ||  ३२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति