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कर्ण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
ततो वाणमय़ं जालं विततं व्योम्न्यदृश्यत |  ६८   क
खद्योतानां गणैरेव सम्पतद्भिर्यथा नभः ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति