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वन पर्व
अध्याय १०
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सुरभिरु उवाच
ततोऽहं तस्य दुःखार्ता विरौमि भृशदुःखिता |  १४   क
अश्रूण्यावर्तय़न्ती च नेत्राभ्यां करुणाय़ती ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति