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सभा पर्व
अध्याय ५८
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युधिष्ठिर उवाच
गवाश्वं वहुधेनूकमसङ्ख्येय़मजाविकम् |  ५   क
यत्किञ्चिदनुवर्णानां प्राक्सिन्धोरपि सौवल |  ५   ख
एतन्मम धनं राजंस्तेन दीव्याम्यहं त्वय़ा ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति