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वन पर्व
अध्याय १०
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व्यास उवाच
कथं जीवेय़ुरत्यन्तं कथं वर्धेय़ुरित्यपि |  २२   क
इति दीनेषु पार्थेषु मनो मे परितप्यते ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति