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विराट पर्व
अध्याय १०
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वैशम्पाय़न उवाच
अथापरोऽदृश्यत रूपसम्पदा; स्त्रीणामलङ्कारधरो वृहत्पुमान् |  १   क
प्राकारवप्रे प्रतिमुच्य कुण्डले; दीर्घे च कम्वू परिहाटके शुभे ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति