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विराट पर्व
अध्याय १०
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वैशम्पाय़न उवाच
तथा स सत्रेण धनञ्जय़ोऽवस; त्प्रिय़ाणि कुर्वन्सह ताभिरात्मवान् |  १३   क
तथागतं तत्र न जज्ञिरे जना; वहिश्चरा वाप्यथवान्तरेचराः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति