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विराट पर्व
अध्याय २५
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वैशम्पाय़न उवाच
सुदुःखा खलु कार्याणां गतिर्विज्ञातुमन्ततः |  २   क
तस्मात्सर्वे उदीक्षध्वं क्व नु स्युः पाण्डवा गताः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति