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विराट पर्व
अध्याय १०
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वैशम्पाय़न उवाच
तं प्रेक्ष्य राजोपगतं सभातले; सत्रप्रतिच्छन्नमरिप्रमाथिनम् |  ३   क
विराजमानं परमेण वर्चसा; सुतं महेन्द्रस्य गजेन्द्रविक्रमम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति