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विराट पर्व
अध्याय १०
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वैशम्पाय़न उवाच
सर्वानपृच्छच्च समीपचारिणः; कुतोऽय़माय़ाति न मे पुरा श्रुतः |  ४   क
न चैनमूचुर्विदितं तदा नराः; सविस्मितं वाक्यमिदं नृपोऽव्रवीत् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति