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विराट पर्व
अध्याय १०
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वैशम्पाय़न उवाच
सर्वोपपन्नः पुरुषो मनोरमः; श्यामो युवा वारणय़ूथपोपमः |  ५   क
विमुच्य कम्वू परिहाटके शुभे; विमुच्य वेणीमपिनह्य कुण्डले ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति