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विराट पर्व
अध्याय १०
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वैशम्पाय़न उवाच
शिखी सुकेशः परिधाय़ चान्यथा; भवस्व धन्वी कवची शरी तथा |  ६   क
आरुह्य यानं परिधावतां भवा; न्सुतैः समो मे भव वा मय़ा समः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति