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विराट पर्व
अध्याय १०
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वैशम्पाय़न उवाच
वृद्धो ह्यहं वै परिहारकामः; सर्वान्मत्स्यांस्तरसा पालय़स्व |  ७   क
नैवंविधाः क्लीवरूपा भवन्ति; कथञ्चनेति प्रतिभाति मे मनः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति