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भीष्म पर्व
अध्याय ४३
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सञ्जय़ उवाच
कुन्तिभोजसुतश्चापि विन्दं विव्याध साय़कैः |  ७२   क
स च तं प्रतिविव्याध तदद्भुतमिवाभवत् ||  ७२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति