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वन पर्व
अध्याय १७४
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वैशम्पाय़न उवाच
नगोत्तमं प्रस्रवणैरुपेतं; दिशां गजैः किंनरपक्षिभिश्च |  १   क
सुखं निवासं जहतां हि तेषां; न प्रीतिरासीद्भरतर्षभाणाम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति