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उद्योग पर्व
अध्याय १०
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शल्य उवाच
ततः प्रनष्टे देवेन्द्रे व्रह्महत्याभय़ार्दिते |  ४४   क
भूमिः प्रध्वस्तसङ्काशा निर्वृक्षा शुष्ककानना |  ४४   ख
विच्छिन्नस्रोतसो नद्यः सरांस्यनुदकानि च ||  ४४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति