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उद्योग पर्व
अध्याय १०
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शल्य उवाच
दिवि देवर्षय़श्चापि देवराजविनाकृताः |  ४७   क
न च स्म कश्चिद्देवानां राज्याय़ कुरुते मनः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति