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अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
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व्यास उवाच
ये चैताः सम्प्रय़च्छन्ति साधवो वीतमत्सराः |  १७   क
ते वै सुकृतिनः प्रोक्ताः सर्वदानप्रदाश्च ते |  १७   ख
गवां लोकं तथा पुण्यमाप्नुवन्ति च तेऽनघ ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति