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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
ततो धर्मसमाय़ुक्तः स जीवः सुखमेधते |  २३   क
इह लोके परे चैव किं भूय़ः कथय़ामि ते ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति