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कर्ण पर्व
अध्याय १०
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सञ्जय़ उवाच
ततः स रुधिराक्ताङ्गो रुधिरेण कृतच्छविः |  १०   क
रराज समरे राजन्सपुष्प इव किंशुकः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति