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कर्ण पर्व
अध्याय १०
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सञ्जय़ उवाच
समासाद्य रणे शूरं प्रतिविन्ध्यं महाप्रभा |  २७   क
निर्भिद्य दक्षिणं वाहुं निपपात महीतले |  २७   ख
पतिताभासय़च्चैव तं देशमशनिर्यथा ||  २७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति