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वन पर्व
अध्याय ११३
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लोमश उवाच
नाडाय़नी चेन्द्रसेना यथैव; वश्या नित्यं मुद्गलस्याजमीढ |  २४   क
तथा शान्ता ऋश्यशृङ्गं वनस्थं; प्रीत्या युक्ता पर्यचरन्नरेन्द्र ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति