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वन पर्व
अध्याय १७४
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वैशम्पाय़न उवाच
सुखोषितास्तत्र त एकरात्रं; सूतानुपादाय़ रथांश्च सर्वान् |  १५   क
घटोत्कचं सानुचरं विसृज्य; ततोऽभ्ययुर्यामुनमद्रिराजम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति