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शल्य पर्व
अध्याय १०
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सञ्जय़ उवाच
आविष्ट इव मद्रेशो मन्युना पौरुषेण च |  २४   क
प्राच्छादय़दरीन्सङ्ख्ये कालसृष्ट इवान्तकः |  २४   ख
विनर्दमानो मद्रेशो मेघह्रादो महावलः ||  २४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति