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उद्योग पर्व
अध्याय ८८
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वैशम्पाय़न उवाच
श्रेष्ठः कुरुषु सर्वेषु धर्मतः श्रुतवृत्ततः |  २२   क
प्रिय़दर्शनो दीर्घभुजः कथं कृष्ण युधिष्ठिरः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति