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शल्य पर्व
अध्याय १०
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सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं कृपः क्रुद्धो वाणवर्षैरपीडय़त् |  ३४   क
द्रौपदेय़ांश्च शकुनिर्यमौ च द्रौणिरभ्ययात् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति