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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
स संरव्धतरो भूत्वा द्रोणः क्षत्रिय़मर्दनः |  ६०   क
अन्यत्कार्मुकमादाय़ भास्वरं वेगवत्तरम् ||  ६०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति