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द्रोण पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
व्याघ्रदत्तश्च पाञ्चाल्यो द्रोणं विव्याध मार्गणैः |  ३४   क
पञ्चाशद्भिः शितै राजंस्तत उच्चुक्रुशुर्जनाः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति