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विराट पर्व
अध्याय २१
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वैशम्पाय़न उवाच
मन्यमानः स सङ्केतमागारं प्राविशच्च तम् |  ४०   क
प्रविश्य च स तद्वेश्म तमसा संवृतं महत् ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति