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शल्य पर्व
अध्याय १०
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सञ्जय़ उवाच
यय़ा माय़ाविनो दृप्तान्सुवहून्धनदालय़े |  ४९   क
जघान गुह्यकान्क्रुद्धो मन्दारार्थे महावलः |  ४९   ख
निवार्यमाणो वहुभिर्द्रौपद्याः प्रिय़मास्थितः ||  ४९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति