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शल्य पर्व
अध्याय १०
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सञ्जय़ उवाच
तां वज्रमणिरत्नौघामष्टाश्रिं वज्रगौरवाम् |  ५०   क
समुद्यम्य महावाहुः शल्यमभ्यद्रवद्रणे ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति